बाकी बड़ी चुनौती

निस्संदेह कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए शुरुआती दौर में भारत सरकार के प्रयासों की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तारीफ की थी। जनता कर्ण्य से लेकर लॉकडाउन की कवायद भी इस दिशा में सार्थक पहल कही गई। मगर हाल ही के दिनों में जिस तेजी से संक्रमण बढ़ा है और लोगों व कतिपय संगठनों की लापरवाही सामने आई उसने चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत के सामुदायिक संक्रमण की दहलीज के करीब नजर आने की आशंकाएं बलवती हुई हैं। ऐसे में तैयारियां बड़े आसन्न संकट को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। कड़वा सत्य है कि इतनी बड़ी आबादी के हिसाब से हमारा चिकित्सा तंत्र नाकाफी है। निसंदेह स्वच्छता, सामाजिक दूरी तथा खुद को अलग-थलग रखना प्रभावी उपाय है, मगर यदि संक्रमण विकराल रूप ले ले तो हमारी तैयारी कहां खड़ी है? सवाल बड़े पैमाने पर संक्रमण की जांच का भी उठाया जा रहा है। निसंदेह देश में जांच का आंकड़ा बहुत कम है। संदेह के दायरे में आए लोगों व रेंडम जांच ही अब तक की गई है। दुनिया के बड़े देशों के लिहाज से भारत में जांच का आंकड़ा बेहद कम है, जिसको लेकर डब्ल्यू.एच.ओ. ने भी सवाल उठाये हैं। अब देश के दौ सौ वैज्ञानिकों और अकादमिक बिरादरी के सदस्यों ने सरकार के लॉकडाउन के प्रयासों की सराहना तो की है मगर इस स्थिति में कोविड-19 जांच सुविधाएं पूरे देश में बढ़ाने का आग्रह किया है। साथ ही कहा है कि महामारी से निपटने के प्रयासों में वैज्ञानिक तार्किकता, कारण, प्रोटोकॉल और नियमों को ही आधार बनाया जाना चाहिए। निसंदेह इस सप्ताह भारत कोरोना से लड़ाई के निर्णायक दौर में पहुंच गया है जो कालांतर देश की दिशा-दशा को तय करने वाला साबित हो सकता है। अभी संक्रमित होने वालों का आंकड़ा अन्य विकसित देशों के मुकाबले कम जरूर है, मगर इसके व्यापक प्रसार की आशंकाओं को मद्देनजर रखते हुए ठोस रणनीति बनानी होगी। वक्त की जरूरत है कि देश में जांच की सुविधाओं को अविलंब विस्तार दिया जाए और संक्रमित लोगों के क्वारंटाइन की अग्रिम व्यवस्था करें। सरकार ने जांच में निजी क्षेत्र को शामिल करके सार्थक पहल की है। मगर अभी भी जांच की गति धीमी है। दक्षिण कोरिया ने जांच की पद्धति को अपनाकर कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में सफलता हासिल की, जिसके लिए पूरी दुनिया में उसकी सराहना हुई। उसने लॉकडाउन जैसे सख्त उपायों के बजाय जांच को प्राथमिकता दी। कोरिया ने प्रत्येक दस लाख लोगों में से चार हजार की जांच की। वहीं भारत में यह आंकड़ा इतनी ही आबादी में पांच का है। जबकि भारत में संदिग्धों की जांच करके उन्हें क्वारंटाइन की रणनीति अपनायी गई। हमें इस महामारी को अपने चिकित्सा सेवा व उपकरणों की स्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। देश को योग्य चिकित्सकों, प्रशिक्षित स्टाफ, पर्याप्त संख्या में बेड और वेंटिलेटरों की सख्त जरूरत है। डब्ल्यू.एच.ओ. के मानकों के हिसाब से एक हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए, जबकि भारत में दस हजार पर एक है। वहीं वेंटिलेटरों की संख्या सीमित है। पब्लिक सेक्टर के पास जहां साढ़े आठ हजार वेंटिलेटर हैं, वहीं प्राइवेट सेक्टर के पास चालीस हजार वेंटिलेटर हैं। दरअसल, कोविड-19 के गंभीर मरीजों को लाइफ सपोर्ट देने के लिए वेंटिलेटरों की जरूरत होती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश को अभी दस गुना अधिक वेंटिलेटरों की जरूरत होगी। कहीं न कहीं महामारी की आहट देखकर भी हम जांच किट्स व पीपीए के उत्पादन में चूके हैं। हालांकि, सरकार ने स्वदेशी कंपनियों को टेस्टिंग किट्स व वेंटिलेटर बनाने की अनुमति दी है मगर जरूरत के हिसाब से जल्दी से उत्पादन खुद में एक चुनौती है। अच्छी बात यह है कि कुछ भारतीय कंपनियों ने कम लागत वाली तेजी से संक्रमण की जांच करने वाली टेस्टिंग किट तैयार कर ली है।